श्रीकृष्ण ने क्यों माना है ध्यान को जरुरी?


श्रीकृष्ण ने क्यों माना है ध्यान  को जरुरी?

भागवत में भगवान कृष्ण ने ध्यान यानी मेडिटेशन पर अपने गहरे विचार व्यक्त किए हैं। वैसे  इन दिनों ध्यान फैशन का विषय हो गया है। वैष्णव लोगों ने कर्मकाण्ड पर खूब ध्यान दिया है लेकिन वे ध्यान को केवल योगियों का विषय मानते रहे। लेकिन भागवत में भगवान ने भक्तों के लिए ध्यान को भी महत्वपूर्ण बताया है।उद्धवजी ने प्रभु से पूछा- हे भगवन! आप यह बतलाइए कि आपका किस रूप से, किस प्रकार और किस भाव से ध्यान करें हम लोग।

भगवान कृष्ण बोले- भाई उद्धव! पहले आसन पर शरीर को सीधा रखकर आराम से बैठ जाएं। हाथों को अपनी गोद में रख लें और दृष्टि अपनी नासिका के अग्र भाग पर जमावे। इसके बाद पूरक, कुंभक और रेचक तथा रेचक, कुंभक और पूरक- इन प्राणायामों के द्वारा नाडिय़ों का शोधन करे। प्रणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए और उसके साथ-साथ इन्द्रियों को जीतने का भी अभ्यास करना चाहिए। 

हृदय में कमल नालगत पतले सूत के समान ऊँकार का चिंतन करे, प्राण के द्वारा उसे ऊपर ले जाए। प्रतिदिन तीन समय दस-दस बार ऊँकार सहित प्राणायाम का अभ्यास करे। ऐसा करने से एक महीने के अंदर ही प्राणवायु वश में हो जाता है। मेरा ऐसा स्वरूप ध्यान के लिए बड़ा ही मंगलमय है। मेरे अवयवों की गठन बड़ी ही सुडोल है। रोम-रोम से शांति टपकती है। मुखकमल अत्यंत प्रफुल्लित और सुंदर है। घुटनों तक लम्बी मनोहर चार भुजाएं हैं। बड़ी ही सुंदर और मनोहर गर्दन है।  मुख पर मंद-मंद मुसकान की अनोखी ही छटा है। दोनों ओर के कान बराबर हैं और उनमें मकराकृत कुण्डल झिलमिल-झिलमिल कर रहे हैं।

वर्षाकालीन मेघ के समान श्यामल शरीर पर तीताम्बर फहरा रहा है। श्रीवत्स एवं लक्ष्मीजी का चिन्ह वक्ष:स्थल पर दायें-बायें विराजमान है। हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, गदा एवं पद््म धारण किए हुए हैं। गले में कौस्तुभ मणि, अपने-अपने स्थान पर चमचमाते हुए किरीट, कंगन, करधनी और बाजूबंद हैं। मेरा एक-एक अंग अत्यंत सुंदर एवं हृदयहारी है। मेरे इस रूप का ध्यान करना चाहिए और अपने मन को एक-एक अंग में लगाना चाहिए।इस चैतन्य अवस्था में साधक को शरीर और आत्मा के बीच भेदात्मक दृष्टि बनाए रखने में सहायता मिलती है।

भगवान शंकर के पूर्ण रूप काल भैरव

एक बार सुमेरु पर्वत पर बैठे हुए ब्रम्हाजी के पास जाकर देवताओं ने उनसे अविनाशी तत्व बताने का अनुरोध किया | शिवजी की माया से मोहित ब्रह्माजी उस तत्व को न जानते हुए भी इस प्रकार कहने लगे - मैं ही इस संसार को उत्पन्न करने वाला स्वयंभू, अजन्मा, एक मात्र ईश्वर , अनादी भक्ति, ब्रह्म घोर निरंजन आत्मा हूँ| मैं ही प्रवृति उर निवृति का मूलाधार , सर्वलीन पूर्ण ब्रह्म हूँ | ब्रह्मा जी ऐसा की पर मुनि मंडली में विद्यमान विष्णु जी ने उन्हें समझाते हुए कहा की मेरी आज्ञा से तो तुम सृष्टी के रचियता बने हो, मेरा अनादर करके तुम अपने प्रभुत्व की बात कैसे कर रहे हो ? इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु अपना-अपना प्रभुत्व स्थापित करने लगे और अपने पक्ष के समर्थन में शास्त्र वाक्य उद्घृत करने लगे| अंततः वेदों से पूछने का निर्णय हुआ तो स्वरुप धारण करके आये चारों वेदों ने क्रमशः अपना मत६ इस प्रकार प्रकट किया -
ऋग्वेद- जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं तथा जिससे सब कुछ प्रवत्त होता है और जिसे परमात्व कहा जाता है, वह एक रूद्र रूप ही है |
यजुर्वेद- जिसके द्वारा हम वेद भी प्रमाणित होते हैं तथा जो ईश्वर के संपूर्ण यज्ञों तथा योगों से भजन किया जाता है, सबका दृष्टा वह एक शिव ही हैं|
सामवेद- जो समस्त संसारी जनों को भरमाता है, जिसे योगी जन ढूँढ़ते हैं और जिसकी भांति से सारा संसार प्रकाशित होता है, वे एक त्र्यम्बक शिवजी ही हैं |
अथर्ववेद- जिसकी भक्ति से साक्षात्कार होता है और जो सब या सुख - दुःख अतीत अनादी ब्रम्ह हैं, वे केवल एक शंकर जी ही हैं|
विष्णु ने वेदों के इस कथन को प्रताप बताते हुए नित्य शिवा से रमण करने वाले, दिगंबर पीतवर्ण धूलि धूसरित प्रेम नाथ, कुवेटा धारी, सर्वा वेष्टित, वृपन वाही, निःसंग,शिवजी को पर ब्रम्ह मानने से इनकार कर दिया| ब्रम्हा-विष्णु विवाद को सुनकर ओंकार ने शिवजी की ज्योति, नित्य और सनातन परब्रम्ह बताया परन्तु फिर भी शिव माया से मोहित ब्रम्हा विष्णु की बुद्धि नहीं बदली |

उस समय उन दोनों के मध्य आदि अंत रहित एक ऐसी विशाल ज्योति प्रकट हुई की उससे ब्रम्हा का पंचम सिर जलने लगा| इतने में त्रिशूलधारी नील-लोहित शिव वहां प्रकट हुए तो अज्ञानतावश ब्रम्हा उन्हें अपना पुत्र समझकर अपनी शरण में आने को कहने लगे| ब्रम्हा की संपूर्ण बातें सुनकर शिवजी अत्यंत क्रुद्ध हुए और उन्होंने तत्काल भैरव को प्रकट कर उससे ब्रम्हा पर शासन करने का आदेश दिया| आज्ञा का पालन करते हुए भैरव ने अपनी बायीं ऊँगली के नखाग्र से ब्रम्हाजी का पंचम सिर काट डाला| भयभीत ब्रम्हा शत रुद्री का पाठ करते हुए शिवजी के शरण हुए|ब्रम्हा और विष्णु दोनों को सत्य की प्रतीति हो गयी और वे दोनों शिवजी की महिमा का गान करने लगे| यह देखकर शिवजी शांत हुए और उन दोनों को अभयदान दिया| इसके उपरान्त शिवजी ने उसके भीषण होने के कारण 'भैरव' और काल को भी भयभीत करने वाला होने के कारण 'काल भैरव' तथा भक्तों के पापों को तत्काल नष्ट करने वाला होने के कारण 'पाप भक्षक' नाम देकर उसे काशीपुरी का अधिपति बना दिया | फिर कहा की भैरव तुम इन ब्रम्हा विष्णु को मानते हुए ब्रम्हा के कपाल को धारण करके इसी के आश्रय से भिक्षा वृति करते हुए वाराणसी में चले जाओ | वहां उस नगरी के प्रभाव से तुम ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे |

शिवजी की आज्ञा से भैरव जी हाथ में कपाल लेकर ज्योंही काशी की ओर चले, ब्रम्ह हत्या उनके पीछे पीछे हो चली| विष्णु जी ने उनकी स्तुति करते हुए उनसे अपने को उनकी माया से मोहित न होने का वरदान माँगा | विष्णु जी ने ब्रम्ह हत्या के भैरव जी के पीछा करने की माया पूछना चाही तो ब्रम्ह हत्या ने बताया की वह तो अपने आप को पवित्र और मुक्त होने के लिए भैरव का अनुसरण कर रही है |भैरव जी ज्यों ही काशी पहुंचे त्यों ही उनके हाथ से चिमटा और कपाल छूटकर पृथ्वी पर गिर गया और तब से उस स्थान का नाम कपालमोचन तीर्थ पड़ गया | इस तीर्थ मैं जाकर सविधि पिंडदान और देव-पितृ-तर्पण करने से मनुष्य ब्रम्ह हत्या के पाप से निवृत हो जाता है |

|| ॐ नमः शिवाय ||


श्री कृष्ण का मानव जीवन जीने का उपदेश

गीता प्रसार  
श्रीमद भगवद एकादश स्कंध अध्याय ७ श्लोक ६-१२

तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बांधवों का स्नेह सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्य प्रेम से मुझमें अपना मन लगाकर सम दृष्टी से पृथ्वी पर स्वच्छंद विचरण करो|

इस जगत में जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से कहा जाता है, नेत्रों से देखा जाता है, और श्रवण आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान है, स्वप्न की तरह मन का विलास है| इसीलिए माया-मात्र है, मिथ्या है-ऐसा जान लो |

जिस पुरुष का मन अशांत है, असयंत है उसी को पागलों की तरह अनेकों वस्तुयें मालूम पड़ती हैं ; वास्तव में यह चित्त का भ्रम ही है | नानात्व का भ्रम हो जाने पर ही "यह गुण है" और "यह दोष है" इस प्रकार की कल्पना करी जाती है | जिसकी बुद्धि में गुण और दोष का भेद बैठ गया हो, दृणमूल हो गया है, उसी के लिए कर्म, अकर्म और विकर्म रूप का प्रतिपादन हुआ है |

जो पुरुष गुण और दोष बुद्धि से अतीत हो जाता है, वह बालक के समान निषिद्ध कर्मों से निवृत्त होता है ; परन्तु दोष बुद्धि से नहीं | वह विहित कर्मों का अनुष्ठान भी करता है, परन्तु गुण बुद्धि से नहीं |

जिसने श्रुतियों के तात्पर्य का यथार्थ ज्ञान ही प्राप्त नहीं कर लिया, बल्कि उनका साक्षात्कार भी कर लिया है और इस प्रकार जो अटल निश्चय से संपन्न हो गया है, वह समस्त प्राणियों का हितैषी सुहृद होता है और उसकी साड़ी वृत्तियाँ सर्वथा शांत रहती हैं| वह समस्त प्रतीयमान विश्व को मेरा ही स्वरुप - आत्मस्वरूप देखता है; इसलिए उसे फिर कभी जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ना पड़ता |

|| जय श्री कृष्ण ||

शिव द्वारा प्रेम का रहस्य


शिव द्वारा प्रेम का रहस्य

पार्वती शिव की केवल अर्धांगिनी ही नहीं अपितु शिष्या भी बनी, वे  नित्य ही अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए शिव से अनेकों प्रश्न पूछती और उनपर  चर्चा करती ! एक दिन उन्होंने शिव से कहा -

पार्वती:- प्रेम क्या है बताइए महादेव, कृप्या बताइए की प्रेम का रहस्य क्या है, क्या है इसका वास्तविक स्वरुप, क्या है इसका भविष्य ! आप तो हमारे गुरु की भी भूमिका निभा रहे हैं इस प्रेम ज्ञान से अवगत कराना भी तो आपका ही दायित्व है ! बताइए महादेव !

शिव:- प्रेम क्या है ! यह तुम पूछ रही हो पार्वती? प्रेम का रहस्य क्या है? प्रेम का स्वरुप क्या है? तुमने ही प्रेम के अनेको रूप उजागर किये हैं पार्वती ! तुमसे ही प्रेम की अनेक अनुभूतियाँ हुयी ! तुम्हारे प्रश्न में ही तुम्हारा उत्तर निहित है !

पार्वती:- क्या इन विभिन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति संभव है?

शिव:- सती के रूप में जब तुम अपने प्राण त्याग जब तुम दूर चली गयी, मेरा जीवन, मेरा संसार, मेरा दायित्व, सब निरर्थक और निराधार हो गया ! मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धाराएँ बहने लगी ! अपने से दूर कर तुमने मुझे मुझ से भी दूर कर दिया था पार्वती ! येही तो प्रेम है पार्वती !तुम्हारे अभाव में मेरे अधूरेपन की अति से इस सृष्ठी का अपूर्ण हो जाना येही प्रेम है ! तुम्हारे और मेरे पुनह मिलन कराने हेतु इस समस्त ब्रह्माण्ड का हर संभव प्रयास करना हर संभव षड्यंत्र रचना, इसका कारण हमारा असीम प्रेम ही तो है ! तुम्हारा पार्वती के रूप में पुनह जनम लेकर मेरे एकांकीपन और मुझे मेरे वैराग्य से बहार नकलने पर विवश करना, और मेरा विवश हो जाना यह प्रेम ही तो है !

जब जब अन्नपूर्णा के रूप में तुम मेरी क्षुधा को बिना प्रतिबन्धन के शांत करती हो या कामख्या के रूप में मेरी कामना करती हो तो वह प्रेम की अनुभूति ही है !

तुम्हारे सौम्य और सहज गौरी रूप में हर प्रकार के अधिकार जब मैं तुम पर  व्यक्त करता हूँ और तुम उन अधिकारों को मान्यता देती हो और मुझे विशवास दिलाती रहती हो की सिवाए मेरे इस संसार में तुम्हे किसी का वर्चस्व स्वीकार नहीं तो वह प्रेम की अनुभूति ही होती है !

जब तुम मनोरंजन हेतु मुझे चौसर में पराजित करती हो तो भी विजय मेरी ही होती है, क्योंकि उस समय तुम्हारे मुख पर आई प्रसन्नता मुझे मेरे दायित्व की पूर्णता का आभास कराती है ! तुम्हे सुखी देख कर मुझे सुख का जो आभास होता है यही तो प्रेम है पार्वती !

जब तुमने अपने अस्त्र वहन कर शक्तिशाली दुर्गा रूप में अपने संरक्षण में मुझे शसस्त बनाया तो वह अनुभूति प्रेम की ही थी !

जब तुमने काली के रूप में संहार कर नृत्य करते हुए मेरे शरीर पर पाँव रखा तो तुम्हे अपनी भूल का आभास हुआ, और तुम्हारी जिह्वया बहार निकली, वही प्रेम था पार्वती !

जब तुम अपना सौंदर्यपूर्ण ललिता रूप जोकि अति भयंकर भैरवी रूप भी है, का दर्शन देती हो, और जब मैं तुम्हारे अति-भाग्यशाली मंगला रूप जोकि उग्र चंडिका रूप भी है, का अनुभव करता हूँ, जब मैं तुम्हे पूर्णतया देखता हूँ बिना किसी प्रयत्न के, तो मैं अनुभव करता हूँ की मैं सत्य देखने में सक्षम हूँ ! जब तुम मुझे अपने सम्पूर्ण रूपों के दर्शन देती हो और मुझे आभास कराती हो की मैं तुम्हारा विश्वासपात्र हूँ ! इस तरह तुम मेरे लिए एक दर्पण बन जाती हो जिसमें झांक कर में स्वयं को देख पाता हूँ की मैं कौन हूँ ! तुम अपने दर्शन से साक्षात् कराती हो और मैं आनंदविभोर हो नाच उठता हूँ और नटराज कहलाता हूँ ! यही तो प्रेम है !

जब तुम बारम्बार स्वयं को मेरे प्रति समर्पित कर मुझे आभास कराती हो की मैं तुम्हारे योग्य हूँ, जब तुमने मेरी वास्तविकता को प्रतिबिम्भित कर मेरे दर्पण के रूप को धारण कर लिया वही तो प्रेम था पार्वती !

प्रेम के प्रति तुम्हारी उत्सुकता और जिज्ञासा अब शांत हुई की नहीं?

शिव-विष्णु लीला

शिव-विष्णु लीला 

एक बार भगवान नारायण अपने वैकुंठलोक में सोये हुए थे. स्वप्न में वो क्या देखते है कि करोड़ो चन्द्रमाओ कि कन्तिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी, स्वर्णाभरण -भूषित, संजय-वन्दित , अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदातिरेक से उन्मत होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है, उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष-गदगद से सहसा शैयापर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे. 

उन्हें इस प्रकार बैठे देखर श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि "भगवान! आपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है?" भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे. अंत में कुछ स्वस्थ होने पर वे गदगद-कंठ से इस प्रकार बोले - "हे देवि! मैंने अभी स्वप्न में भगवान श्री महेश्वर का दर्शन किया है, उनकी छबी ऍसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी. मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है. अहोभाग्य! चलो, कैलाश में चलकर हमलोग महादेव के दर्शन करते है . 

यह कहकर दोनों कैलाश की और चल दिए. मुश्किल से आधी दूर ही गये होंगे की देखते है भगवान शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी और आ रहे है, अब भगवान के आनंद का क्या ठिकाना? मानो घर बैठे निधि मिल गई. पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले. मानो प्रेम और आनंद का समुन्द्र उमड़ पड़ा. एक दुसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आन्दाश्रू बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया. दोनों ही एक दुसरे से लिपटे हुए कुछ देर मुक्वत खड़े रहे. प्रश्नोतर होनेपर मालूम हुए की शंकर जी ने भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न देखा मानो विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे है, जिस रूप में वे अब उनके सामने खड़े थे. दोनों के स्वप्न का वृतांत अवगत होने पर दोनों ही लगे एक दुसरे से अपने यहाँ लिवा ले जाने का आग्रह करने.. नारायण कहते वैकुण्ठ चलो और शम्भू कहते कैलाश की और प्रस्थान कीजिये. दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहाँ चला जाये? 

इतने में ही क्या देखते है वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारद जी कही से आ निकले. बस, फिर क्या था? लगे दोनों ही उनसे निर्णय कराने कि कहाँ चला जाये? बेचारे नारद जी स्वयं परेशान थे उस अलौकिक मिलन को देखकर , वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने. अब निर्णय कौन करे? 

अंत में यह तय हुई कि भगवती उमा जो कह दे वही ठीक है. भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रही, अंत में दोनों को लक्ष्य करके बोली -"हे नाथ! हे नारायण! आपलोगों के निश्छल, अनन्य एवम अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास-स्थान अलग-अलग नहीं है, जो कैलास है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है, केवल नाम में ही भेद है. यही नहीं , मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो है. और तो और, मुझे तो अब यह स्पष्ट दिखने लगा ही आपके भार्याये भी एक ही है, दो नहीं. जो मै हु वही श्रीलक्ष्मी है और जो श्रीलक्ष्मी है वही मै हु.. केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ धारणा हो गई है कि आपलोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानो दुसरे के प्रति ही करता है, एक की जो पूजा करता है, वह स्वाभाविक ही दुसरे कि भी करता है और जो एक को अपूज्य मानता है वह दुसरे कि भी पूजा नहीं करता... मै तो यह समझती हु कि आप दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकालतक घोर पतन होता है, मै देखती हु कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्र्वच्चना कर रहे है, मुझे चक्कर में डाल रहे है, मुझे भुला रहे है. अब मेरी यह प्रार्थना है कि आपलोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिये .. श्रीविष्णु यह समझे कि हम शिवरूप में से वैकुण्ठ जा रहे है और महेश्वर यह माने कि हम विष्णुरूप से कैलाश गमन कर रहे है .. इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा कि प्रशंसा करते हुए दोनों अपने अपने लोक को चले गये. 

लौटकर जब विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि - 'प्रभु! सबसे अधिक प्रिय आपको कौन है? इस पर भगवान बोले - 'प्रिय! मेरे प्रियतम केवल श्री शंकर है, देहधारियो को अपने देह कि भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय है, एक बार मै और शंकर दोनों ही पृथ्वी पर घुमने निकले, मै अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा. थोड़ी देर के बाद ही मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गई. ज्यो ही हमलोगों की चार आँखे हुई कि हमलोग पुर्वजन्मअर्जित विद्या कि भांति एक दुसरे कि प्रति आक्रष्ट हो गये "वास्तव में मै ही जनार्दन हु. और मै ही महादेव हु, अलग-अलग दो घडो में रखे हुए जल कि भांति मुझमे और उनमे कोई अंतर नहीं है, शंकरजी के अतिरिक्त शिवकी अर्चा करनेवाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है, इसके विपरीत जो शिव कि पूजा नहीं करतेवे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते...

श्री कृष्ण द्वारा प्रेम रहस्य

श्री कृष्ण द्वारा प्रेम रहस्य 

श्रीमद भगवत कथा में श्री कृष्ण स्वयं प्रेम के विषय में कहते हुए :- जो प्रेम करने पर प्रेम करता है उसका तो सारा उद्योग (मेहनत) स्वार्थ को लेकर है | लेना देना मात्र है | न तो उन लोगों में सौहाद्र है और न तो धर्म |उनका प्रेम तो केवल स्वार्थ के लिए ही है ; इसके अतिरिक्त उनका कोई प्रयोजन नहीं है | 

जो लोग प्रेम न करने वाले से भी प्रेम करते हैं- जैसे स्वभाव से ही करुणाशील सज्जन और माता पिता - उनका ह्रदय स्वभाव से ही सौहाद्र से, हितैषिता से भरा रहता है और सच पूछो, तो उनके व्यवहार में निश्चल सत्य और पूर्ण धर्म भी है |

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो प्रेम करने वालों से भी प्रेम नहीं करते , न प्रेम करने वालों का तो उनके सामने कोई प्रश्न ही नहीं है | ऐसे लोग चार प्रकार के होते हैं : 

पहले वे हैं जो अपने स्वरुप में मस्त रहते हैं - जिनकी दृष्टी में कभी द्वेत भासता ही नहीं | 
दूसरे वे, जिन्हें द्वेत तो भासता है, परंतू जो कृत-कृत्य हो चुके हैं; उनका किसी से कोई प्रयोजान नहीं है | 
तीसरे वे हैं, जो जानते ही नहीं की हमसे कौन प्रेम करता है | 
और चौथे वे हैं, जो जानबूझ कर अपना हित करने वाले परोपकारी गुरु तुल्य लोगों से भी द्रोह करते हैं, उनको सताना चाहते हैं | 

आगे श्री कृष्ण गोपियों से कहते हैं :- मैं तो प्रेम करने वालों से भी प्रेम का वैसा व्यवहार नहीं करता, जैसा की करना चाहिए | मैं ऐसा केवल इसीलिए करता हूँ की उनकी चित्त वृत्ति और भी मुझमे लगे, निरंतर लगी ही रहे| जैसे निर्धन पुरुष को कभी बहुत सा धन मिल जाये और फिर खो जाये तो उसका ह्रदय खोये हुए धन की चिंता से भर जाता है , ऐसे ही मैं भी अपने प्रेमियों से मिल मिलकर छिप छिप जाता हूँ | इसमें संदेह नहीं है की तुम लोगों ने मेरे लिए लोक-मर्यादा, वेदमार्ग और अपने सगे सम्बन्धियों को भी छोड़ दिया है| ऐसी स्तिथि में तुम्हारी मनोवृत्ति और कहीं न जाये, अपने सौंदर्य और सुहाग की चिंता न करने लगे, मुझमे ही लगी रहे- इसीलिए परोक्ष रूप से तुम लोगों से प्रेम करता हुआ ही मैं छुप जाता हूँ | इसीलिए तुम लोग मेरे प्रेम में दोष न निकालो | तुम सब मेरी प्यारी हो और मैं तुम्हारा प्यारा हूँ | तुमने मेरे लिए घर गृहस्ती की उन बेड़ियों को तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते| मुझसे तुम्हारा ये मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है| यदि मैं अमर शरीर से-अमर जीवन से अंनत काल तक तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ तो भी नहीं चूका सकता | मैं जनम जन्मों तक तुम्हारा ऋणी हूँ | तुम आपने सौम्य स्वभाव से, प्रेम से मुझे उऋण (ऋण मुक्त) कर सकती हो परन्तु मैं तो तुम्हारा ऋणी ही रहूँगा ||

गायत्री के पाँच मुखों का रहस्य


गायत्री के पाँच मुखों का रहस्य


शिवजी ने गायत्री के पाँच मुखों का रहस्य बताते हुए कहा हे पार्वती! यह संपूर्ण ब्रह्मान्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है | इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है | ये पांच तत्व ही गायत्री के पांच मुख हैं | मनुष्य के शरीर में इन्हें पांच कोश कहा गया है | ये पांच कोश अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के नाम से जाने जाते हैं | ये पांच अनंत ऋद्धि सिद्धियों के अक्षय भंडार हैं | इन्हें पाकर जीव धन्य हो जाता है | 

पार्वती ने पूछा :- हे प्रभु ! इन्हें जाना कैसे जाता है? इनकी पहचान क्या है? 

शिवजी बोले :-  हे पार्वती ! योग साधना से इन्हें जाना जा सकता है, पहचाना जा सकता है | इन्हें सिद्ध करके जीव भव सागर के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है | जीवन मरण के चक्र से छूट जाता है | जीव के पांच तत्वों की श्रीवृद्धी और पुष्टि इस प्रकार से होती है - 'शरीर' की अन्न से, 'प्राण' की तेज से, 'मन' की नियंत्रण से, 'ज्ञान' की विज्ञान से और 'आनंद' की कला से | गायत्री के पांच मुख इन्हीं पांच तत्वों के प्रतीक हैं |

शिव गीता भाग - 2

गीता प्रसार 


श्रीभगवानुवाच ।



अव्यक्तसे कालकी उत्पत्ति हुई तथा उसीसे प्रधान पुरुषकी उत्पत्ति हुई है और उनसे यह सब जगत उत्पन्न हुआ इस कारण यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्ममय है ॥१॥




जो संसारमे सब ओरको अपने कर्ण किये और सबको व्याप्त करके स्थित हो रहा है, सब जगतके पैर जिसके चरण और सबके हस्त, नेत्र, शिर, मुख, जिसके हाथ, नेत्र, शिर, मुख है तथा च श्रुतिः (सहस्त्रशीर्षाः पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ) इति ॥२॥




जो सम्पूर्ण इन्द्रिय और गुणोंके आभाससे युक्त शरीरमे स्थित है और जो सब इन्द्रियोंसे वर्जित है सबका आधार सदानन्दस्वरूप अप्रगट द्वैतरहित ॥३॥




संपूर्ण उपमाके योग्य, सबसे परे नित्य तथा प्रमाणसेभी परे, निर्विकल्प, निराभास, सबमें व्यापक, परं अमृत स्वरूप ॥४॥




सबके पृथक्‌ और सबमे स्थित, निरन्तर वर्तमान निश्चल अविनाशी निर्गुण और परंज्योतिस्वरूप ऐसा उस स्थानको विद्वानोनें वर्णन किया है ॥५॥




वह सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा बाह्य और आभ्यन्तरसे परे जिसे कहते है वही मै सर्वगत शान्तस्वरूप ज्ञानात्मा परमेश्वर हू ॥६॥




यह स्थावर जंगमात्मक संसार मुझसेही उत्पन्न हुआ है, सब प्राणि मेरे ही निवास स्थान है, ऐसा वेदके जाननेवाले कहते है ॥७॥




एक प्रधान और एक पुरुष यह जो दो वर्णन किये है उन दोनोंका संयोग करनेवाला अनादि काल है यह तीनों अनादि है और अव्यक्तमें निवास करते है इनका वो तदात्मक रूप है वही साक्षात मेरा स्वरूप है ॥८॥९॥




जो महतसे लेकर यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न करती है वह संपूर्ण देहधारियोंकी मोहित करनेवाली प्रकृति कहलाती है ॥१०॥




यह पुरुषही प्रकृतिमें स्थित होकर प्रकृतिके गुणोंको भोगता है, अहंकारसहित होनेसे पच्चीसतत्त्वनिर्मित यह देह कहाता है ॥११॥




प्रकृतिका प्रथम विकारही महान कहाता है यह आत्मा विज्ञानशक्तियुक्त स्थित रहता है पीछे उसीसे विज्ञानशक्तिका जाननेहारा अहंकार उत्पन्न होता है ॥१२॥




उस एकही महान आत्माका नाम अहंकार कहा जाता है वही जीव और अंतरात्मा कहा जाता है, यह तत्त्वके जाननेवालोंने कहा है ॥१३॥




यही जन्म लेकर, सुख और दुःख भोगता है यद्यपि वह विज्ञानात्मा है परन्तु मनके संग होनेसे वह मन उसके उपकारक है ॥१४॥




अज्ञानके कारण इस पुरुषको संसारकि प्राप्ति हुई है और प्रकृतिसे पुरुषका संयोग होनेसे कालान्तरमें पुरुषको अज्ञानकी प्राप्ति हुई है ॥१५॥




यह कालही जीवों को उत्पन्न करता और कालही संहार करता है, सम्पूर्ण ही कालके वशमें है, परन्तु काल किसीके वशमे नही है ॥१६॥




वही सनातन सबके ह्रदयमे स्थित होकर इस सबको जानता है और वशमें रखकर शासन करता है, उसेही भगवान प्राणस्वरूप सर्वज्ञ पुरुषोत्तम कहते है ॥१७॥




मनीषी विद्वानोंने इन्द्रियोंसे परे मनको कहा है, मनसे परे अहंकार, अहंकारसे परे महत् है ॥१८॥




महानसे परे अव्यक्त और अव्यक्तसे परे पुरुष है, पुरुषसे परे भगवान प्राण स्वरूप है, उससे यह सब जगत हुआ है ॥१९॥




प्राणसे परे व्योम (आकाश) और व्योमसे परे अग्नि ईश्वर है, सो मै सबसे व्याप्त शान्तस्वरुप हूं और मुझसे यह सब जगत विस्तृत हुआ है ॥२०॥




मुझसे परे और कुछ नही है प्राणी मुझको जानकर मुक्त हो जाता है संसारमे स्थावर जंगम इनमें किसीको भी नित्यता नही है ॥२१॥




केवल एक मै ही व्योमरूप महेश्वर हू सो मै ही सब जगतको उत्पन्न करके संहार करता हूं ॥२२॥




मायास्वरूप मुझमें कालकी संगति होकर मेरी स्थितिसे ही काल सम्पूर्ण जगतके उत्पन्न करनेमे समर्थ हुआ है कारण (कलनात् सर्वभूतानां कालः स परिकीर्तितः) सम्पूर्ण प्राणियोंकी आयुकी संख्या करनेसे ही इसका नाम काल हुआ है ॥२३॥




यही अनन्तात्मा सब जगतको यथायोग्य रखता है, यही वेदका अनुशासन है, किसीको महादेव कालात्मा कालान्त आदिनामसे उच्चारण करते है, यही दैत्योंको संहार करते है इस प्रकार जानना उचित है ॥२४॥




सूतजी बोले - हे ब्रह्मवादी ऋषियो! तुम सावधान होकर सुनो हम उन देवदेव आदि पुरुषका माहात्म्य कहते है जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रवृत हुआ है ॥२५॥




शिवजी बोले- अनेक प्रकारके तप ज्ञान दान और यज्ञसे पुरुष मुझे इस प्रकर नही जान सकते जिस प्रकार श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझको जाननेको समर्थ होते है इससे केवल श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझे शीघ्र जान सकते है ॥२६॥




मै ही सर्वव्यापी होकर सब प्राणियोके अन्तःकरणमे स्थित हूं, हे मुनीश्वरो! मुझे यह संसार सब लोकोंका साक्षी नही जानता है ॥२७॥




जो यह परमात्मा सबके ह्रदयान्तरमे निवास करता है, उसीके अन्तरमें यह सब जगत है वही धाता विधाता कालाग्निस्वरूप सर्वव्यापक परमात्मा मै हू ॥२८॥




मुझको मुनि और सब देवता भी नही जानते है तथा ब्रह्मा इन्द्र मनु औरभी विख्यात पराक्रमी मेरे रूपको यथार्थ जाननेमें समर्थ नही होते ॥२९॥




मुझही एक परमेश्वरको सदा वेद स्तुति करते रहते है, (सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति) और ब्राह्मणादि अनेक प्रकारके छोटे बडे यज्ञोद्वारा यजन करते रहते है ॥३०॥




पितामह ब्रह्मासहित सम्पूर्ण लोक नमस्कार करते है, और योगी जन सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति भगवानका ध्यान करते है ॥३१॥




मै ही सम्पूर्ण हवियोंको भोक्ता और फल देनेवाला हूं, मै ही सबका शरीररूप होकर सबका आत्मा सबमे स्थित हू ॥३२॥




मुझे विद्वान् धर्मात्मा और वेदवादी देख सकते है उनके निकट जो नित्यप्रति मेरी उपासना करते है ॥३३॥




ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, धार्मिक मेरे उपासना करते है उनको मै परमानन्द परमपद स्वरूप अपने स्थानको देता हूं ॥३४॥




और जो शूद्र आदि नीच जाति अपने धर्ममें स्थित है और वह मेरे भक्ति करते है वे कालसे यद्यपि मिले हुए है तथापि मेरी कृपादृष्टिसे मुक्त हो जाते है ॥३५॥




मेरे भक्त पापरहित हो जाते है उनका कभी नाश नही होता प्रथम तो यही मेरीप्रतिज्ञा है कि मेरे भक्तोंका कभी नाश नही होता यदि वह बीचमे ही सिद्धि प्राप्त होनेसे पूर्व मृत्तक हो जाय तो फिर योगीके घरमे जन्म ले सत्संगको प्राप्त हो मुक्त हो जाता है ॥३६॥




जो मुर्ख मेरे भक्तोंकी निन्दा करता है उसने देवदेव साक्षात मेरीही निन्दा की और प्रेमसे उनका पूजन करता है उसने मानो मेराही पूजन किया ॥३७॥




परिपुर्ण शिवस्वरूपमें और क्या शुभ किया जाय, जो कुछ शिवके भक्तके निमित्त किया है, वह सब कुछ मुझ शिवस्वरूपके ही वास्ते किया है ॥३८॥




जो प्रेमसे मेरे आराधनके कारण पत्र पुष्प फल जल नियमित होकर प्रदान करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्यारा है ॥३९॥




मै ही जगतकी आदिमे सृष्टि उत्पन्न करनेसे ब्रह्मा परमेष्ठी कहा जाता है, तथा पालन करनेसे उत्तम पुरुष परमात्मा इस नामसे गाया जाता है ॥४०॥




मै ही सम्पूर्ण योगियोंका अविनाशी गुरु हू, मै हि धर्मात्माओंका रक्षक और वेदविरोधियोंका नाश करनेवाला हू ॥४१॥




मै ही योगियोंको संसारबन्धनके सब प्रकारके क्लेशसे छूडानेवाला हू, मैही सब प्रकार संसारसे रहित होकर संसारका कारणभी हू ॥४२॥




मै ही सब संसारको उत्पन्न पालन करनेहारा तथा संहार करता हू कारण कि, कार्य अपने कारणमे लय हो जाता है, इससे सब जगत मुझसे उत्पन्न होकर मुझमेंही लय होजाता है तथा च श्रुतिः (विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता) और यह मेरी महाशक्ति लोकको मोहनेवाली माया है जो अनेक प्रकारसे जगतको उत्पन्न करती है (अजामेका लोहितशुक्लकृष्णा बह्वीः मजाः सृजमानाम सरूपाः) इति श्रुतेः ॥४३॥




और मेरीही यह परा शक्ति विद्या नामसे गाई जाती है मै योगियोंके ह्रदयमे स्थित होकर उस अज्ञानकी उत्पन्न करनेवाली संसारमे भ्रमानेवाली मायाको नाश करता हूँ ॥४४॥




मैही सम्पूर्ण शक्तियोंके प्रेरणा करनेवाला हू, और मै ही निवृत करनेवाला हू, मैही अमृतका निधान हू ( स दाधार पृथ्वी द्यामुतेभामिति श्रुतेः) श्रुतिसे भी यह सिद्ध है कि, यह विश्वको धारण कर रहा है ॥४५॥




मैही सम्पूर्ण जगत हूं और मुझमें ही सब जगत है अर्थात यह सब कुछ मै ही हू दूसरी वस्तु कुछ नही है (सर्व खल्विंद ब्रह्म नेह नानास्ति किंचनेति श्रुतेः) यह सब जगत मुझसे ही उत्पन्न होकर मुझमे ही लय हो जाता है (यथोर्णनाभिः सृजते गृहणते च) जैसे मकडी अपनेमेंसे जाला निकालकर ग्रहण कर लेती है इसी प्रकार मै जगत उत्पन्न कर फिर लय करलेता हू ॥४६॥




मै ही भगवान ईश्वर स्वयंज्योति सनातन हू, मै ही परमात्मा परब्रह्म हू, मुझसे परे कोई दुसरा नही है ॥४७॥




यह एक शक्ति जो सबके अन्तःकरणमें स्थित होकर अनेक प्रकारके जगतको उत्पन्न करती है यही मेरी शक्ति मुझ ब्रह्मस्वरूपमें स्थित होकर जगतकी रचना करती है और मुझही में स्थित है ॥४८॥




दूसरी शक्ति नारायण देव जगन्नाथ जगन्मय विष्णुस्वरूप होकर इस संपूर्ण जगतको स्थापित करती अर्थात पालती है ॥४९॥




तीसरी महती शक्ति है जो सम्पूर्ण जगतका संहार करती है उस शक्तिका नाम तामसी है तथा उसका रौद्ररूप है कालनाम है ॥५०॥




कोई मुझे ज्ञानसे देखते है, कोई ध्यानसे, कोई भक्तियोग और कोई कर्मयोगसे अर्थात कर्मकाण्डके आश्रयसे मेरा यजन करते है ॥५१॥




परन्तु इन सब भक्तोंमे वह मुझे सबसे अधिक प्यारा जो नित्य प्रतिज्ञासे मेरी आराधना करता है ॥५२॥




और भी जो मेरे भक्त मेरी उपासना करते है, वे भी मुझको प्राप्त होजाते है , और फिर उनका जन्म नही होता (यथा इह स्थातुमपेक्षते तस्मै सर्वेश्वर्ये ददाति यत्र कुत्रापि म्रियते देहान्ते देवः परं ब्रह्मं तारकं व्याचष्टे येनामृतीभूत्वा सोऽमृतत्वं च गच्छति) अर्थात् जो उसकी भक्ति करता है और उन्नतिको प्राप्त होनेकी इच्छा करता है, उसे भगवान सम्पूर्ण ऐश्वर्य देते है और वह ही मृतक हो देहान्तमें भगवान उसे तारक मंत्रका उपदेश करते है, जिससे उसका फिर जन्म नही होता ॥५३॥




मैने ही सम्पूर्ण प्रधान और पुरुषात्मक जगत उत्पन्न किया है मुझही मे यह सम्पूर्ण जगत स्थित है और मुझसे ही प्रेरित होता है ॥५४॥




मै इसका प्रेरक नही हू, अर्थात उपाधिसे प्रेरण करनेवाला हू ऐसा विद्वान जानते है परन्तु वास्तवमें मे प्रेरक नही, हे परमयोग साधनेवाले ब्राह्मणो! जिस प्रकारसे मै प्रेरक नही हू और जिस प्रकारसे प्रेरक हू इसको जो जानते है वह मुक्त स्वरूप है अर्थात् तत्वविचारसे जानना उचित है कि, वास्तवमें ब्रह्म कुछ नही करता ॥५५॥




मै इस संसारको जो स्वभावसे वर्तमान है सब ओरसे देखता हूं परन्तु महायोगेश्वर काल भगवान काल यह सब कुछ स्वयं करता है ॥५६॥




पंडित जन मेरे शास्त्रके अनुष्ठान करनेवालोंको योगी कहते है और यह भगवान महादेव महाप्रभु योगेश्वर कहलाते ॥५७॥




यह भगवान् महादेव महेश्वर की सम्पूर्ण प्राणियोंसे अधिक होनेसे और परेसे परे होनेसे परमेष्ठी ब्रह्मा कहलाते है अर्थात गुण कर्मोके अनुसार अनेक नाम है इनके यथार्थ जाननेसे परम पदकी प्राप्ति होती है ॥५८॥




जो इस प्रकार मुझको महायोगियोंके ईश्वर जानते है वह विकल्परहित योगको प्राप्त होता है इसमें कुछ संदेह नही ॥५९॥




मैही परमानन्द स्वरूप मे स्थित होकर सबका प्रेरक देव हू मै ही सबमे नृत्य करता हू अर्थात कर्मानुसार सब भूतोंका भ्रमण कराता हू जो इस बातको जानता है वही वेदका जाननेवाला होता है इस प्रकार तत्त्वज्ञानसे मुझे जानकर परम पदको प्राप्त होजाता है ॥६०॥




ॐ तत्सदिति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु शिवराघवसंवादे ब्रह्मनिरूपणं नाम सप्तदशोध्यायः ॥१७

शिव गीता


 शिवजी द्वारा श्री रामचंद्र जी को शिव गीता का उपदेश 
श्रीरामचन्द्र बोले - हे भगवन् ! आपने मोक्षमार्ग सम्पूर्ण वर्णन किया अब इसका अधिकारि कहिये । इसमें मुझको बड़ा संदेह है । आप विस्तारपूर्वक वर्णन किजिये ॥१॥

श्रीभगवानुवाच ।

श्रीभगवान बोले - हे राम! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, ब्रह्मचारी, गृहस्थ तथा बिना यज्ञोपवीत हुआ ब्राह्मण ॥२॥

वानप्रस्थ, जिसकी स्त्री मृतक होगई हो, संन्यासी, पाशुपत व्रत करनेहारे इसके अधिकारी है और बहुत कहने से क्या है जिसके अन्तःकरणमें शिवजीके पूजनकी प्रबल भक्ति हो ॥३॥

वही इसमें अधिकारी है और जिसका चित्त दूसरी ओर लगा हुआ है वह इसमें अधिकारी नही तथा मुर्ख अंधे बहरे मूक शौचाचाररहित, स्नान संध्यादि विहित कर्मोंसे रहित ॥४॥

अज्ञोंका उपहास करनेवाले, भक्तिहीन, विभूति रुद्राक्षधारी, पाशुपतव्रतवालोंसे द्वेष करनेवाले चिह्नधारी इनमेंसे किसीकाभी इस शास्त्रमें अधिकार नही है ॥५॥

जो मुझसे ब्रह्मके उपदेश करनेवाले गुरुसे पाशुपतके व्रत धारण करनेवालोंसे वा विष्णुसे द्वेष करता है, उसका करोड जन्ममें भी उद्धार नही होता, आज कलके उन पुरुषोंको इस श्लोकके ऊपर विचार करना चाहिये, जो अज्ञानवश एक दुसरेसे द्रोह करते है । वह सब एकही रूप है । शिव तथा विष्णुमें कोइ भी भेद नही है, भेद माननेवालोंकी गति नही होती इसमें प्रमाण (स ब्रह्मा स शिवः स हरिः सेंद्रः सोअक्षरः परमः स्वराट्‌) अर्थात वही परमात्मा शिव हरि इन्द्र अक्षर परम स्वराट है (एक रूपं बहुधा यः करोति) वही एक अनेक रूपको धारण करता है और चाहे अनेक प्रकारके यज्ञादिककर्ममें तत्पर हो, और शिवज्ञानसे रहित हो तो शिवकी भक्ति न होनेका कारण वह संसारसे मुक्त नही होता ॥६॥७॥

जो वेदबाह्य धर्मोमें केवल फलकी इच्छा करके आसक्त होते है, उन्हे केवल दृष्टमात्र फलकी प्राप्ति होती है वे मोक्ष शास्त्रके अधिकारी नही है ॥८॥

काशी, द्वारका, श्रीशैल पर्वत, व्याघ्रपुर, इन क्षेत्रोंमे शरीर त्यागनेसे इस पुरुषको मेरी कृपासे तारक ब्रह्मकी प्राप्ति होती है ॥९॥

जिसके हाथ पैर और सम्पूर्ण इन्द्रिय, तथा मन वशमें है विद्या तप और कीर्ति विद्यमान है, वही तीर्थका फल प्राप्त करते है विकारी मनवाले तीर्थका फल प्राप्त नही कर सकते ॥१०॥

जिस ब्राह्मणका यज्ञोपवीत नही हुआ है उसे अधिकार है परन्तु वह वेदका उच्चारण नही कर सकता केवल माता पिताके श्राद्धकर्ममें उच्चारण कर सकता है ॥११॥

जबतक ब्राह्मणका उपनयन नही होता, तबतक वह शूद्रकी ही समान है, नाम संकीर्तन और ध्यानमें तो सब ही अधिकारी है ॥१२॥

शिवजीमीं तादात्म्य ध्यानसे अर्थात (शिवोऽहं इस प्रकार अन्तःकरनकी एक वृत्ति करनेसे यह प्राणी संसारके पार हो जाता है जिस प्रकार ध्यान तप वेदाध्ययन तथा दूसरे कर्म है यह ध्यान करनेके सहस्त्र भागकी भी तो समान नही हो सकते ॥१३॥

जाति, आश्रम, अंग, देश, काल किंवा आसनादि साधन, यह कोईभी ध्यानयोगकी समान नही है ॥१४॥

चलते फिरते बैठते उठते बोलते शयन करते, अथवा दूसरे कार्योमें भी युक्त हो, और उनके अनेक पातकोंसे युक्त हो, वह भी ध्यान करनेसे मुक्त होजाता है ॥१५॥

इस ध्यानयोगके करनेसे नाश नही होता, नित्यनैमित्तिक कर्मकी समान इसमें प्रत्यवाय नही है, यह थोडासा अनुष्ठान क्रियाभी प्राणीको महाभयसे रक्षा करता है ॥१६॥

अतिआश्चर्य अथवा भय और शोक प्राप्त हुआ हो वा छींकने अथवा और कोई रोगमें जो किस बहानेसेभी मेरा उच्चारण करता है वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है ॥१७॥

महापापीभी यदि देहान्तमें मेरा स्मरण करे तो (नमः शिवाय) इस पंचाक्षरी विद्याका उच्चारण करे तो निःसंदेह उसकी मुक्ती हो जाती है ॥१८॥

जो अपने आत्मासे ही आत्माको देखते सब संसारको शिवरूप देखते है उनको क्षेत्र तीर्थ वा दूसरे कर्मोके करनेसे क्या लाभ है उन्हे करनेकी आवश्यकता नही ॥१९॥

विभूति और रुद्राक्ष सदा सबको धारण करना चाहिये, शिवभक्ति करनेवाले योगी हो अथवा न हो सब रुद्राक्ष धारण करे जिन्हे शिवभक्ति प्राप्त होनेकी इच्छा हो ॥२०॥

जो अग्निहोत्रकी भस्म और रुद्राक्षको धारण करता है, वह महापापी होगा तौ भी निःसन्देह मुक्त हो जायेगा ॥२१॥

और शिव उपासनाके कर्म करै अथवा न करै जो केवल शिवका नामभी जपता है वह सदा मुक्तस्वरूप है ॥२२॥

अन्तकालमें जो रुद्राक्ष और विभूतिको धारण करता है, उसे चाहे महापाप भी लगे हो नरोंमे नीचभी हो किसी प्रकारसे भी यमके दूत उसे स्पर्श करनेको समर्थ नही होते ॥२३॥२४॥

जो कोई बेलवृक्षके जडकी मिट्टी शरीरमें लगाता है उसके निकट यमदूत किसी प्रकार से नही आ सकते ॥२५॥

श्रीराम उवाच ।

श्रीरामचन्द्र बोले- हे भगवन् किन मूर्तियोंमें पूजन करनेसे आप प्रसन्न होते हो, यह जाननेकी मुझे बड़ी इच्छा है, सो आप कृपाकर कहिये ॥२६॥

श्रीभगवान बोले - मृत्तिका, गोबर, भस्म, चंदन, वालुका, काष्ठ, पाषाण, लोहखण्ड, केशरादि रंग, कांसी ,खर्पर (जस्त) पीतल ॥२७॥

तांबा, रुपा, सुवर्ण, अथवा अनेक प्रकारके रत्न पारा अथवा कपूर ॥२८॥

इनमें जो अपनेको प्राप्त हो सके और जो इष्ट हो उससे शिवलिंगकी मूर्ति निर्माण करे, इस प्रकार प्रीतिसे मेरी उपासना करे तो कोटिगुणा फल होता है ॥२९॥

गृहस्थी पुरुशोंको उचित है कि, मृत्तिका काष्ठ लोह कांसी अथवा पाषाणकी प्रतिमा करे, उसमें पूजन करनेसे गृहस्थियोंको सदा आनंद की प्राप्ति होती है ॥३०॥

मृत्तिकाकी प्रतिमा पूजन करनेसे आयु, काष्ठकी प्रतिमा पूजन करनेसे सम्पत्ति, कांस्यकी पूजन करनेसे कुलवृद्धि, लोहकी प्रतिमा पूजन करनेसे धर्मबुद्धि, पाषाणकी प्रतिमा पूजन करनेसे पुत्र प्राप्ति क्रमसे होती है, बिल्ववृक्षके नीचे अथवा उसके फलमें जो मेरी आराधना करता है ॥३१॥

इस लोकमें महालक्ष्मीको प्राप्त होकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है और बिल्ववृक्षके नीचे बैठकर जो विधिपूर्वक मंत्रो को जपे ॥३२॥

तो एकही दिनमे उस जप करनेवालेको पुरश्चरणका फल मिलता है, और जो मनुष्य बेलके वनमें कुटी बनाकर नित्य प्रति निवास करे ॥३३॥

उसके जपमात्रसे ही सब मंत्र सिद्ध हो जाते है, पर्वत के ऊपर नदी के किनारे, बिल्वके नीचे शिवालयमे ॥३४॥

अग्निहोत्रकी शालामें विष्णुके मंदिरमें जो मंत्रका जप करता है, दानव यक्ष राक्षस इसके जपमें विघ्न नही कर सकते ॥३५॥

उसे कोई पास स्पर्श नई कर सकता, वह शिवके सायुज्य लोकको प्राप्त होता है, पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश ॥३६॥

पर्वत किम्वा अपनी आत्माहीमें जो मनुष्य मेरा पूजन करता है, एक लवमात्रकी पूजा करनेसे उसे सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है ॥३७॥

हे राम अपने आत्मामें जो पूजन करता है, उसकी बराबरी दूसरी पूजा नही आत्मामें पूजन करनेहारा चाण्डालभी मेरे लोकको प्राप्त होता है । सम्पूर्ण शुभकर्म आत्माहीको अर्पण करना, उसी का विचार करना, पापाचरण न करना, यही आत्माकी पूजा है ॥३८॥

ऊर्णावस्त्रके आसनपर पूजा करनेसे मनुष्यको सब कामनाकी प्राप्ति हो जाती है, मृगचर्मके आसनपर पूजा करनेसे मुक्ति और व्याघ्रचर्मपर पूजा करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ॥३९॥

कुशासनपर बैठकर पूजा करनेसे ज्ञान, पत्रके आसनपर आरोग्यता, पाषाणके आसनपर दुःख और काश्ठके आसनपर पूजा करनेसे अनेक प्रकारके रोग होते है ॥४०॥

वस्त्रपे बैठनेसे लक्ष्मी प्राप्ति और पृथ्वीपर बैठकर जपनेसे मंत्र सिद्ध नही होता, उत्तर वा पूर्वको मुखकर जप और पूजाका प्रारम्भ करना उचित है ॥४१॥

हे रामचन्द्र! सावधान होकर सुनो, अब मालाकी विधि कहता हूँ, स्फटिककी मालासे साम्राज्य प्राप्त होता है पुत्रजीव जियापोतेकी मालासे अत्यन्त धनकी प्राप्ति होती है ॥४२॥

कुशकी ग्रन्थिकी मालासे आत्मज्ञान और रुद्राक्षकी मालासे सम्पूर्ण कार्योकी सिद्धि होती है, प्रवाल (मूंगा) की मालासे सब लोकके वश करने को सामर्थ्य होती है ॥४३॥

आमलेके फलोंकी माला मोक्षकी देनेवाली है, मोतियोंकी माला सम्पूर्ण विद्याओंकी देनेहारी है ॥४४॥

माणिक्यकी माला त्रिलोकीकी स्त्रियोंको वश करनेहारी है नील मरकत मणिकी माला शत्रु को भय देती है ॥४५॥

सोनेकी बनी माला बड़ी शोभाको तथा लक्ष्मीको देती है, चांदीकी मालासे मनेच्छित कन्या प्राप्त होती है ॥४६॥

और एक पारेकी माला जो औषधिद्वारा बनती है, वह सम्पूर्णही कामनाको प्राप्त करती है एक सौ आठ १०८ मणियोंकी माला सबसे उत्तम होती है ॥४७॥

सौ दानेकी उत्तम, पचास दानेकी मध्यम, अथवा ५७ दानेकी भी मध्यम है और सत्ताईस दानेकी माला अधम कहाती है ॥४८॥

पच्चीस दानोंकी भी अधम होती है,जो सौ दानोंकी माला हो तो पचास अक्षर (अ) से (ल) तक उलटे सीधे क्रमसे हो सकते है, अर्थात मेरुतक एकबार गिन सकता है ॥४९॥

इस प्रकारसे स्पष्ट स्थापन करे, और किसीको माला न दिखावे गुप्त जपे ॥५०॥

जो अक्षरोंकी कल्पना करके मालाद्वारा जप किया जाता है, वर्णविन्यास (कल्पना) से एकही बारमें उसका पुरश्चरण हो जाता है ॥५१॥

बायां चरण गुदस्थानपर रक्खे अर्थात एडी लगावे और दाहिना चरण उपस्थके ऊपर रखकर बैठे, यह उत्तम और अतिश्रेष्ठ योनिबंध आसन कहाता है ॥५२॥

जो योनिमुद्राके आसनसे बैठकर सावधान हो जप करता है कोई मंत्र हो अवश्य सिद्धिकी प्राप्ति हो जाती है ॥५३॥

छिन्न, रुद्र, स्तंभित, मिलित, मूर्च्छित, सुप्त, मत्त, हीनवीर्य, दग्ध, त्रस्त, शत्रुपक्षके जाननेवाले यह मंत्र शास्त्रमें मंत्रोके प्रकार लिखे है उनमें इनके लक्षण लिखे है कि इस प्रकारका मंत्र ऐसा होता है ॥५४॥

तथा बालक, यौवन, वृद्ध, मत्त इत्यादि किसी प्रकारका भी दूषित मंत्र क्यो न हो योनिमुद्राके आसनसे जप करे तो सिद्ध हो जाता है ॥५५॥

इसी मुद्रासे वे मंत्र सिद्ध होते है दूसरे प्रकारसे नही होते उस कालसे लेकर मध्याह्न कालतक मंत्रका जप करना कहा है, इससे उपरान्त जपे तो कर्ताका नाश होता है यह सम्पूर्ण काम्यफलोंके पुरश्चरणकी विधि है ॥५६॥५७॥

नित्य नैमित्तिक तपश्चर्याका नियम नही है, चाहे जबतक जितनी इच्छा हो जप करता रहे, उसमे कुछ दोष नही होता ॥५८॥

जो मेरी मूर्तिका ध्यान करता हुआ निष्काम बुद्धिसे रुद्रजप अथवा षडक्षर मंत्र ॐकार सहित जितेन्द्रिय होकर जपता (ॐ नमः शिवाय) यह षडक्षर मंत्र है ॥५९॥

हे राम! अथवा अथर्वशीर्ष वा कैवल्य उपनिषदके जो मन्त्र जपता है वह उसी देहसे स्वयं शिव हो जाता है अर्थात् सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होता है ॥६०॥

जो नित्यप्रति शिवगीताको पढता और नित्य जप करता वा श्रवण करता है वह निःसन्देह संसारसे मुक्त हो जाता है ॥६१॥

सूत उवाच ।

सूतजी बोले, हे शौनकादि ऋषियो ! भगवान् शिवजी रामचन्द्रजीसे इस प्रकार उपदेश कर वहां ही अन्तर्धान होगये और आत्मज्ञानके प्राप्त होनेसे रामचन्द्रनेभी अपनेको कृतार्थ माना ॥६२॥

और एकाग्र चित्तसे ध्यान करते है उनके हाथमें मुक्ति स्थित रहती है, इस कारण हे मुनियो! नित्य प्रति सावधान होकर शिवगीताको सुनो ॥६४॥

अनायास मुक्ति हो जायगी इसमें कुछ भी संदेह नही, इसमें शरीरको क्लेश नही, मानसिक क्लेश नही, धनका व्यय नही ॥६५॥

न और किसी प्रकारकी पीडा है, केवल श्रवणसे ही मुक्ति हो जाती है, हे ऋषियो! इस कारण तुम नित्यप्रति शिवगीताका श्रवण करो ॥६६॥

ऋषय ऊचुः ।

ऋषि बोले, हे सूतजी! आजसे तुम्ही हमारे आचार्य पिता और गुरु हो जो कि, आपने हमको अविद्याके पार तार दिया ॥६७॥

जन्म देनेवालेसे ब्रह्मज्ञान देनेवालेको गौरव अधिक है इसकारण हे सूत! सत्यही तुमसे अधिक कोई दूसरा गुरु हमारा नही है ॥६८॥

व्यासजी बोले - ऐसा कहकर सम्पूर्ण ऋषि सायंसंध्या करनेके निमित्त गये, और सूतपुत्रकी बडाई करते गोमती नदीके समीप ध्यान करने लगे शिवपरायण हुए ॥६९॥

इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायायोगशास्त्रे शिवराघवसंवादे गीताधिकारनिरूपणं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६